Monday, 28 March 2016

(Jago-Jago)जागो -जागो

जागो -जागो !!!देश के युवा पीढ़ी विराट कोहली का विराट सन्देश : -गर्ल फ्रेंड से ब्रेकअप के बाद गुस्सा शराब के मयखाने पर नहीं अपने कर्म क्षेत्र में दिखाना चाहिए!!!....... रणजीत कुमार 



Tuesday, 15 March 2016

Holi(होली )

होली हिंदुओं का एक बेहद लोकप्रिय पर्व है, जो हिंदू पंचाग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को (अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, मार्च के महीने में) मनाया जाता है।होली भारत का प्रमुख त्योहार है। होली जहाँ एक ओर सामाजिक एवं धार्मिक त्योहार है, वहीं रंगों का भी त्योहार है।हिंदु शास्‍त्रों में होली का त्‍यौहार मनाने के संदर्भ में कुछ बहुत ही प्रचलित कहानियों का उल्‍लेख मिलता है। जहां सर्वाधिक प्रचलित कहानी हिरण्‍यकशिपु की है।होली का त्‍यौहार हिरण्‍यकशिपु की बहन होलिका के मारे जाने की स्‍मृति में मनाया जाता है। हिरण्‍यकशिपु का पुत्र प्रहलाद, भगवान विष्‍णु का बहुत ही बड़ा भक्‍त था और इसी बात से हिरण्‍यक‍शिपु अपने पुत्र प्रहलाद से क्रोधित रहते थे व हमेंशा किसी न किसी तरह से वे प्रहलाद को मारने का प्रयास करते थे।
इसीलिए एक बार उन्‍होने अपनी बहन होलिका से कहा कि, "तुम्‍हे तो अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्‍त है। इसलिए तुम मेरे पुत्र को लेकर अग्नि में बैठ जाओ, जिससे वह जलकर नष्‍ट हो जाए।"होलिका अपने भाई की आज्ञा का पालन करते हुए प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई लेकिन प्रहलाद की जगह होलिका ही जलकर भस्‍म हो गई क्‍योंकि होलिका को इस बात वरदान प्राप्‍त था कि जब वह अकेली अग्नि में रहेगी तब नहीं जलेगी लेकिन होलिका इस बात को भूल गई और इसी कारण से वह जलकर भस्‍म हो गई।

होली की हर कथा में एक समानता है कि उसमें ‘असत्य पर सत्य की विजय’ और ‘दुराचार पर सदाचार की विजय’ का उत्सव मनाने की बात कही गई है। इस प्रकार होली मुख्यतः आनंदोल्लास तथा भाई–चारे का त्यौहार है।

 होली रंगों का त्योहार है, हँसी–ख़ुशी का त्यौहार है लेकिन आज होली के भी अनेक रूप देखने  को मिलते हैं। प्राकृतिक रंगों के स्थान पर रासायनिक रंगों का प्रचलन, भंग–ठंडाई की जगह नशेबाजी और लोक–संगीत की जगह फिल्मी गानों का प्रचलन इसके कुछ आधुनिक रूप हैभोजपुरी म्यूज़िक एल्बमों की बात करें तो इनके गीतों के बोल दोअर्थी होते हैंवीडियो एल्बमों में इनका फ़िल्मांकन बहुत ही अश्लील तरीक़े से किया जाता है।आज बाज़ार में उपलब्ध ज़्यादातर भोजपुरी एल्बमों के गीत इतने भड़काऊ होते हैं कि कई बार महिला यात्रियों को ऑटो और सार्वजनिक बसों में इन्हें बंद करवाने के लिए आवाज़ उठानी पड़ती है। एक समय रहा...जब भोजपुरी गीत, सुनने वालो में गहराई में डूब जाते थे जैसे  "नदिया के पार" के गाना "कवने दिशा में लेके चला रे बटोहिया" ।बीबीसी हिंदी के एक पत्रकार के द्वारा शारदा सिन्हा  से पूछे गये ये सवाल -  अश्लीलता के काले बादलों से घिरते जा रहे भोजपुरी होली गीतों के बीच आशा की किरण क्या हो सकती है? इस सवाल के जवाब में शारदा सिन्हा कहती हैं,हमें उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए वर्तमान में भोजपुरी गीतों पर भौंडेपन और अश्लीलता की परत ज़रूर चढ़ गई है लेकिन समय के साथ अच्छे गीतों को गाया जाएगा तो यह धूल झड़ जाएगी। हम सभी ये आशा करते है की हमारे भोजपुरी समाज के शुभचिंतक समय रहते सुधार कर लेंगे।बिहार में होली के गायन की अपनी परंपरा रही है ,और यह वर्ग और क्षेत्र के हिसाब से बंटती चलती रही है। होली गीतों के गायन से क्षेत्र विशेष के लोगों के बीच परंपराओं की जानकारी मिल जाती है।होली पर्व के पीछे तमाम धार्मिक मान्यताएं, परम्पराएं और ऐतिहासिक घटनाएं छुपी हुई हैं। पर अंतत: इस पर्व का उद्देश्य मानव–कल्याण ही है। लोकसंगीत, नृत्य, नाट्य, लोककथाओं, क़िस्से–कहानियों और यहाँ तक कि मुहावरों में भी होली के पीछे छिपे संस्कारों, मान्यताओं व दिलचस्प पहलुओं की झलक मिलती है।वास्तव में हमारे द्वारा होली का त्यौहार मनाना तभी सार्थक होगा जब हम इसके वास्तविक महत्व को समझकर उसके अनुसार आचरण करें।इसलिए वर्तमान परिवेश में जरूरत है कि इस पवित्र त्यौहार पर आडम्बर की बजाय इसके पीछे छुपे हुए संस्कारों और जीवन मूल्यों को अहमियत दी जाए तभी व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र सभी का कल्याण होगा।
...............................................................................रणजीत कुमार 

Monday, 7 March 2016

women day(महिला दिवस)

8 मार्च का दिन हमें याद दिलाता है कि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है.सिर्फ एक दिन के लिए महिलाओं का गुनगान करके उन्हें सम्मान देना और दूसरी और उनको इंसान की शक्ल में घूमने वाले न जाने कितने भेडियों की शिकार होती है यह नारी, जिसका ज़िक्र तक नहीं होता समाज में, न ही उसके बारे में किसी को जानकारी हो पाती है .छलना, उनके साथ कपट भाव रखना, रास्ते चलते छेड़छाड़ करना, स्त्री को लज्जित करना, शराब पीकर महिलाओं के साथ मारपीट करना ...यह सब हमारे पुरुष वर्ग को शोभा नहीं देता.अगर सच में महिलाओं के प्रति हमारे मन में आदर और सम्मान है तो सबसे पहले हमें चाहिए कि हम उन मां, बहन, बेटियों, बहुओं और उन मासूम बच्चियों के प्रति पहले अपना नजरिया बदलें और उन्हें हीन दृष्टि से देखना बंद करें.महिला दिवस मनाने का केवल यह मतलब नहीं है कि एक दिन तो बहुत ऊंचे स्थान पर बैठाकर मान-सम्मान दे दिया जाए और दूसरे ही दिन राह चलती लड़कियों से छेड़खानी शुरू कर दी जाए.कभी धर्म को हथियार बनाकर, तो कभी संस्कारों, परम्परा, लोक लाज की आड़ लेकर आए दिन तुगलकी फरमान जारी किए जाते हैं जो महिलाओं को सुरक्षा देने के बहाने उनपर ही लगाम लगा जातीं हैं.
अतीत में नारी के प्रति अन्याय, अत्याचार के गवाह सती प्रथा, विधवा विवाह निषेध,बाल विवाह,पर्दा प्रथा जैसी प्रथाओं का अंत होने बावजूद नारी शोषण आज भी जारी है.दहेज़ हत्यायें,बलात्कार,घरेलु हिंसा आज भी नित्य समाचार पत्रों की सुर्खियाँ बन रही है.महिला आयोग द्वारा किये जा रहे प्रयास एवं कानूनी योगदान प्रभावकारी साबित नहीं हो पाए है. प्रत्येक नारी को स्वयं शिक्षित, आत्म निर्भर हो कर, अपने अधिकार पुरुष से छिनने होंगे. दुर्व्यवहार बलात्कार जैसे घिनोने अपराधों से लड़ने के लिए अपने अंदर शक्ति उत्पन्न करना होगा.औरअंत में मैथिलीशरण गुप्त जी ये पंक्तियाँ याद आता है मुझे
“ अबला जीवन, हाय, तुम्हारी यही कहानी
आँचल में है दूध और आँखों में पानी . “
...................................................................................................रणजीत कुमार