Monday, 16 May 2016

An open letter of a proud Bihari (एक गर्व बिहारी का खुला पत्र)

क प्राउड बिहारी का खुला-ख़त
आदरणीय बिहार के लिए चिंतित देशवासियों!
सादर प्रणाम!

ख़त हमेशा से ट्रेंड में है| कोई चोरी-छिप्पे ख़त खोलता है तो कोई खुला-ख़त लिखता है| पता नहीं एक लड़की अपना पहला ख़त किसके नाम लिखना चाहती है? पिता को, प्रेमी को, पति को, बेटे को या समाज को? लेकिन मैं लिख रही हूँ उनको जो अब तक बिहार को स्टीरियोटाइप छवि में बांधे हुए हैं और उसमें खुद को इतना ढाल चुके हैं कि देख नहीं पाते बिहार का वर्तमान क्या है|
अब तक तो आप समझ ही चुके होंगे आगे का तेवर थोड़ा तल्ख़ होगा| अगर आप उस तेवर को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो ये ख़Yत आपके लिए हीं है|

मैं इतिहास की बात नहीं करती, सभी जानते हैं भारतीय इतिहास का हश्र बिहार के बिना बिल्कुल वैसा ही होता जैसा “कॉमेडी नाइट्स विद कपिल” का कपिल के बाद हुआ| मैं किसी घमंड में नहीं हूँ, लेकिन मैं उन में से भी नहीं हूँ जो दो दिन बिहार से बाहर रह के खुद को बिहारी कहलाने में शर्म महसूस करने लगते हैं| गर्व से कहती हूँ, “आई एम अ प्राउड बिहारी”|

आप कभी बिहार आये नहीं हैं लेकिन पूर्वाग्रह में हैं “यहाँ जंगलराज है”| यहाँ के लोग डर में हैं, दहशत में हैं, घर से बाहर नहीं निकलते होंगे, सड़कों पे कर्फ्यू सा माहौल होगा, लड़कियाँ तो बाहर निकलते ही लूट ली जाती होंगी, घरों में डाके पड़ते होंगे, यह इतना देहाती है कि कोई छोटा-मोटा सामान भी मिलना मुश्किल होता होगा, अनपढ़-गंवार लोग ही रहते होंगे जिन पर बाहुबली टाइप किसी दबंग का राज है, सड़कें तो गड्ढों में ही होंगी और पता नहीं क्या क्या... शायद जैसा फिल्मों में दिखाते हैं| सच कहूँ मुझे यही डर साउथ को ले कर लगा रहता है, न जाने वहां कौन सी बात पर कट्टा निकाल लेते होंगे, किस गुमान में आकर कटार चल जाती होगी, सड़कें बहुत अच्छी होंगी लेकिन उसका इस्तेलाम सिर्फ जल्द-से-जल्द दुश्मन तक पहुँचने में ही होता होगा, हर दस मिनट में बलात्कार या दंगे का भय रहता होगा और पता नहीं क्या-क्या... जैसा फिल्मों में दिखाते हैं| इतना तो यकीन रहता है, ये फिल्म है इसलिए यहाँ हीरो आ गया, असल में तो नहीं आता होगा, जबकि ये यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि वहां उस तरह की गुंडागर्दी नहीं होती होगी|

मम्मी को हजार बार कह चुकी हूँ, आज आपको भी बता ही दूँ, मैं दिल्ली-मुंबई नहीं जाना चाहती| दिल्ली की दिल्लगी के बारे में इतना सुन-पढ़ चुकी हूँ कि जब तक जुडो-कराटे न सीखूं, वहां घुमने भी ना जाऊं, और मजबूरन कभी जाना ही पड़े तो सारे लड़कों को अपना दुश्मन ही मान के चलूँ, जेब में जरूरत की चीजों से ज्यादा सुरक्षा की चीजें भरी पड़ी हों| और मुंबई ? वहां तो इतने धमाके होते हैं कि अगर पटाखे की आवाज भी सुन लूँ तो सदमे में मर जाऊं|
मैं भी जानती हूँ और आप भी, ये सारी बातें कोरी कल्पना मात्र हैं| लेकिन इन्हीं वजहों से तो आपने बिहार को “जंगली” कहा था न!

मैं किसी पार्टी विशेष की पक्षधर नहीं रही, ना ही हूँ, न होने के गुण ही हैं मुझमें, लेकिन आपका हर बात में हमें नीचा दिखाने का सबसे अजीब तर्क मुझे बोलने पर विवश कर देता है, वो ये कि “तुम्हीं ने तो नहीं चुना फलाना पार्टी को, अब भुगतो”| साहब एक बात बता दो, क्या उस पार्टी की सरकार जहाँ है वहां कोई मर्डर नहीं हुआ, किसी की किसी से कोई दुश्मनी नहीं हुई, रोड एक्सीडेंट्स टल गये, बलात्कारियों को इतना भय था कि वो मुँह छुपाये घूमने लगे? मुझे जहाँ तक याद है सबसे बड़ा सांप्रदायिक दंगा उसी फलाना पार्टी की देन थी न| लेकिन फिर आप कहेंगे “वो बीती बात है” और उन्हें बकायदा देश की बागडोर दे देंगे, तो फिर आप ये क्यों नहीं मानते कि बिहार में भी “जंगलराज” बीती बात ही है|
लेकिन नहीं, आप सिर्फ इस बात के लिए हर एक यु.पी.-बिहार वाले को ताने देते फिरेंगे| आप ये तो याद रखते हैं कि बिहार विधानसभा में किसी खास पार्टी की हार हुई, इसलिए हम छोटी सोच वाले हैं, फिर आप ये क्यों भूल जाते हैं कि लोकसभा में अगर बहुमत में वो बैठे हैं तो इन्हीं यु.पी.-बिहार वालों के दिए 102 (71+31) सीट्स की बदौलत|

हाँ, बिहार में आते ही आपकी सुपरफास्ट “पैसेंजर” में बदल जाती है, लेकिन ऐसा सिर्फ बिहार में नहीं होता| अगर होता भी है तो वजह है बिहार को ना मिलने वाली पसेंजेर्स ट्रेन, जिसकी यहाँ सख्त जरूरत है|
हाँ, बिहार में ट्रकों-ट्रेक्टरों में बजने वाले “भोजपुरी गानों” में “अश्लीलता” होती है, लेकिन बैन तो हनी सिंह के गाने भी हुए हैं, चिकनी-चमेली हिंदी में सुन के बड़ा प्यारा लगता है, और साउथ की फिल्मों की सुपर क्वालिटी वाले आइटम नंबर्स? नहीं उन पर ध्यान क्यों दें, वो तो आर्ट का हिस्सा है, हमें गालियाँ तो सिर्फ बिहारियों को सुनानी है|

आप ये तो याद रखते हैं कि बिहारी गाने में “अश्लीलता” होती है, लेकिन आप याद नहीं रखना चाहते कि यहाँ के लोकगीत आपके कानों को सुकून भी देते हैं| आपको भोजपुरी सिनेमा की कोई घटिया कहानी याद रहती है लेकिन याद नहीं रखना चाहते “मिथिला मखान” कैसे राष्ट्रीय पुरस्कार ले उड़ा| मैं शायद भूल रही हूँ, “स्वच्छ भारत मिशन” तो सिर्फ बिहार को साफ़ करने के लिए चलाया गया था| पूरा देश अब तक इसका इन्तेजार क्यों कर रहा था? बलात्कार के लगातार बढ़ते ग्राफ के बाद भी आपने उसे “बदतमीज राजधानी” नहीं कहा| लेकिन बिहार को “जंगलराज रिटर्न” का तमगा पहले ही पहना दिया| अब हर समाचार को आप इसी चश्मे से देखेंगे, स्वाभाविक सी बात है|

बिहार गरीब हो सकता है लेकिन यहाँ की जीवटता और अमीरी यहाँ के किसानों में है, जो हर साल कोशी की बाढ़ और दक्षिण के सुखाड़  में तबाह होने के बाद भी आत्महत्या जैसा कदम नहीं उठाते| क्या किसी ने बताया आपको, दक्षिण बिहार में मॉनसून को आये 3 साल हो चुके है!

कहीं किसी एम.एल.ए. की बिगडैल औलाद ने मौत का तमाशा बनाया और आप सभी बिहारियों को कोसने में लग गये, बिहार टूरिस्म की तरफ से खुद की लाइन्स बनाने लग गये, गाड़ियों के पीछे लगे वो मैसेज दिखाने लग गये| लेकिन आप तब कहाँ थे जब दूसरे एम.एल.ए. की औलाद यु.पी.एस.सी. में 100 के अंदर आती है| आपने तब क्यों बिहार टूरिस्म के नारे नहीं दिए “देंगे ऐसी बुद्धि छा जाओगे संसार में, कुछ दिन तो गुजरो बिहार में”? क्यों आपने कार के पीछे लिखा हुआ पोस्टर नहीं दिखाया “कृपया हॉर्न बजा के ध्यानभंग न करें, आप बिहार में हैं, अंदर भावी यु.पी.एस.सी. टॉपर बैठा हो सकता है|”

बिहार नशामुक्त हो गया, आप चुप रहे| बिहार से अश्लील गाने बंद हो गये, आप चुप रहे| खैर चुप तो आप तब भी रहते हैं जब असम और महाराष्ट्र से बिहारियों को भगाया जाता है, हत्याएं की जातीं हैं| दिल्ली में डॉक्टर नारंग की सरेआम जान ले ली जाती है, आप इसे मात्र एक घटना करार देते हैं, मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में व्यापम के तहत लोग मारे जाते हैं, आप इसे महज एक घटना करार देते हैं, लेकिन बिहार में किसी पत्रकार की मौत को आप सीधा “बिहार में बहार” वाला कैप्शन पहना देते हैं| क्यों? इन सारी घटनाओं का जितना दुःख आपको होता है उस से कहीं ज्यादा हमें होता है, हम भी इसी देश में पैदा हुए है|

बिहारी जहाँ भी हैं अपनी खास जगह बनाये हुए हैं, आपको इस बात की चिढ हो सकती है| ये दिखावे में विश्वास नहीं करते, कर के दिखा देते हैं, आपको इस से भी चिढ़ हो सकती है| बिहार अच्छी जगह नहीं, ये आपकी धारणा है| आपको इसे बदलना होगा| हमारी कोशिशें लगातार बनी हुईं हैं| हम दिखाते रहे हैं बिहार की अच्छाई को लेकिन आप उसे देखना ही नहीं चाहते| आप अपनी उसी धारणा के साथ खुश हैं| आप बिहारियों की अच्छाई क्यों प्रोमोट करेंगे भला! आपको तो ताने सुनाने हैं सामने जो भी बिहारी आये|

आप पंजाबी, हरियाणवी, बंगाली, मराठी टोन में बोलें तो एलिट क्लास, हम बिहारी टोन में कुछ कह दें तो “गंवार”? क्यों? कभी सोच के देखो ये “गंवारपन” किसके अंदर है? उसमें जो आपकी बात सुन के हँस के टाल देता है या आपमें जो ऐसा कह के जता देते हैं आप कितने “बुद्धिमान” हैं|

एक बात याद रहे, बिहार में सत्ता किसी की भी रही हो, बिहारियों ने कभी अपनी पहचान नहीं खोयी, न आजादी से पहले और ना ही आजादी के बाद| 15 साल हमे परिभाषित नहीं करते| 15 साल के बाद से अब तक की आपकी सोच आपको जरुर परिभाषित करती है|

ये सब मैं किसी गुमान में नहीं कह रही, ना ही इसलिए कह रही हूँ कि आप बिहार में हो रहे इन दुर्घटनाओं पर चर्चा ना करें| चर्चा होनी चाहिए, मुद्दे बनने चाहियें तभी तो रॉकी जैसे लोगों पर कार्यवाई होगी, जिनसे परेशानी हमें भी है| क्या आप कोई एक जगह बतायेंगे जहाँ सुरक्षा की 100% गारंटी ले सकते हों? अगर नहीं, तो बिहार को कोसना बंद करें, इन सब के लिए बिहारियों को बदनाम-जलील करना बंद करें|

खैर शिकायत आपसे भी नहीं है, शिकायत तो उनसे है जो इन तानों से बचने के लिए अपने बिहार की पहचान छुपाने की कोशिश करते हैं| खुद बिहार से बाहर रह के यहाँ वोटिंग करवाने का दंभ भरते हैं, और उस फलाना पार्टी के नहीं जीतने पर सारा दोष यहाँ रह रहे तमाम बिहारियों पर डालकर खुद को यहाँ की राजनीति से दूर बताने लगते हैं| इस सोच को बदलिए, ये आपकी जरूरत है, हमारी नहीं| और हो सके तो पूर्वाग्रह से बाहर निकलिए, बिहार आईये, बिहारियों से मिलिए तब धारणा बनाईये, हम उसे भी सहर्ष स्वीकार करेंगे|
जय हिन्द!
 नेहा नूपुर



Saturday, 7 May 2016

माँ का दुलारा

माँ का दुलारा है ,तू 
उनकी आँखो का तारा है ,तू 

तेरे खुशियों से चमकते आँखो के खातिर 
माँ अपनी नम आँखे छिपाकर 
हर ज़िद्द को है ,पूरा किया 

जब भी कोई छोटी- बड़ी कामयाबी पाया 
माँ अपनी आँखो से खुशियों की मोतियाँ है ,लुटाई 

हे ! माँ का दुलारा 
है तुम से विनम्र निवेदन 
कभी भी पथरीली आँखे 
अपनी माँ के ऊपर मत दिखलाना 

रणजीत कुमार 

Saturday, 2 April 2016

Bihar Me Sharab Bandi(बिहार में शराबबंदी)

शराब चाहे जिस हालत में पिया हो होता यह बेकार,
शरीर तोड़ता बिमारी लाता कर देता लाचार जीवन। 
शराबी के अब यही ठिकाने,पकड़े जाने पर भरे जुर्माने जाए जेल। 
शराब का जो हुआ शिकार, उसका उजड़ा घर परिवार।

शराबबंदी के इस ऐतिहासिक निर्णय के पीछे की कहानी बड़ी दिलचस्प है। 9 जुलाई,  2015 को आयोजित ग्रामवार्ता कार्यक्रम में  पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में स्वयं सहायता समूह के कार्यक्रम में महिलाओं ने नीतीश कुमार से गांवों में शराब बंद कराने का अनुरोध किया था।
उस वक्त नीतीश अपना संबोधन खत्म कर चुके थे लेकिन इसी बीच एक महिला की आवाज गूंजी-मुख्यमंत्री जी, शराब बंद कराइए घर बर्बाद हो रहा है । कई और महिलाएं बोलने लगीं। उन महिलाओं की अपील उनके दिल को इस कदर छू गई कि वे दुबारा माइक पर गए और कहा कि अगर उन्होंने सत्ता में वापसी की तो शराबबंदी जरूर लागू करेंगे। नीतीश कुमार की इस घोषणा को विपक्षी दलों ने चुनावी घोषणा कह कर बहुत ही हल्के में लिया।चुनाव के समय भी बार-बार विरोधी दलों ने इस बात को लेकर नीतीश कुमार पर ताना जड़ा कि नीतीश केवल वोट लेने के लिए शराब बंदी की घोषणा कर रहे हैं, लेकिन नीतीश कुमार ने अपने इस एलान को बिहार के सत्ता में आते ही 20 नवंबर, 2015 - मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पांचवीं बार सत्ता संभाली। उनके साथ 28 मंत्रियों ने शपथ ली ।26 नवंबर, 2015- मद्य निषेध दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में सीएम ने किया एलान 1 अप्रैल, 2016 से पूर्ण शराबबंदी लागू करने का एलान छह दिनों के अंदरसत्ता मेंआते ही  वादा पूरा किया ।
1अप्रैल 2016 से अब बिहार में शराब पीने वाले की खैर नहीं। बिहार विधानसभा सभा में पेश किये गये बिल बिहार उत्पाद (संशोधन) विधेयक 2016 के तहत प्रथम चरण में ग्रामीण इलाके में पूर्ण शराबबंदी तथा दूसरे चरण में शहरी इलाकों में शराबबंदी किया जाना है।अब तक प्रचलित कानून में कम सजा का प्रावधान था उसे सख्त किया गया है।सरकार की नई उत्पाद नीति के लागू होने के बाद अब राज्य के किसी कोने में देशी शराब का न तो निर्माण होगा और ना ही इसकी खरीद-बिक्री या सेवन की इजाजत होगी।
संशाधित विधेयक के तहत अवैध व जहरीजी शराब के उत्पादन और बिक्री पर उम्रकैद से लेकर मौत तक की सजा का प्रावधान है।बिहार में शराबबंदी को लागू करने के लिए उत्पाद विभाग में एक नियंत्रण कक्ष बनाए जाने के साथ एक टोल फ्री नंबर 15545 और 18003456268 जारी किए है।
महिलाओं की आवाज़ पर शराबबंदी को लेकर किये वादे को नीतीश कुमार ने सत्ता में फिर से आते ही पूरा किया और इस ऐलान के साथ आधी आवादी के चेहरे पर मुस्कान आ गई।अब सभी को मिलकर समाज का मानस बदलना होगा, लेकिन नशे के आदि हो चुके लोगों की बड़ी संख्या को अचानक से नशा के विमुख करना आसान नहीं होगा।क्योंकि गुजरात में शराबबंदी है, लेकिन अवैध शराब का कारोबार नहीं रुक रहा है।
 .......................................................................................................रणजीत कुमार 

Monday, 28 March 2016

(Jago-Jago)जागो -जागो

जागो -जागो !!!देश के युवा पीढ़ी विराट कोहली का विराट सन्देश : -गर्ल फ्रेंड से ब्रेकअप के बाद गुस्सा शराब के मयखाने पर नहीं अपने कर्म क्षेत्र में दिखाना चाहिए!!!....... रणजीत कुमार 



Tuesday, 15 March 2016

Holi(होली )

होली हिंदुओं का एक बेहद लोकप्रिय पर्व है, जो हिंदू पंचाग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को (अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, मार्च के महीने में) मनाया जाता है।होली भारत का प्रमुख त्योहार है। होली जहाँ एक ओर सामाजिक एवं धार्मिक त्योहार है, वहीं रंगों का भी त्योहार है।हिंदु शास्‍त्रों में होली का त्‍यौहार मनाने के संदर्भ में कुछ बहुत ही प्रचलित कहानियों का उल्‍लेख मिलता है। जहां सर्वाधिक प्रचलित कहानी हिरण्‍यकशिपु की है।होली का त्‍यौहार हिरण्‍यकशिपु की बहन होलिका के मारे जाने की स्‍मृति में मनाया जाता है। हिरण्‍यकशिपु का पुत्र प्रहलाद, भगवान विष्‍णु का बहुत ही बड़ा भक्‍त था और इसी बात से हिरण्‍यक‍शिपु अपने पुत्र प्रहलाद से क्रोधित रहते थे व हमेंशा किसी न किसी तरह से वे प्रहलाद को मारने का प्रयास करते थे।
इसीलिए एक बार उन्‍होने अपनी बहन होलिका से कहा कि, "तुम्‍हे तो अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्‍त है। इसलिए तुम मेरे पुत्र को लेकर अग्नि में बैठ जाओ, जिससे वह जलकर नष्‍ट हो जाए।"होलिका अपने भाई की आज्ञा का पालन करते हुए प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई लेकिन प्रहलाद की जगह होलिका ही जलकर भस्‍म हो गई क्‍योंकि होलिका को इस बात वरदान प्राप्‍त था कि जब वह अकेली अग्नि में रहेगी तब नहीं जलेगी लेकिन होलिका इस बात को भूल गई और इसी कारण से वह जलकर भस्‍म हो गई।

होली की हर कथा में एक समानता है कि उसमें ‘असत्य पर सत्य की विजय’ और ‘दुराचार पर सदाचार की विजय’ का उत्सव मनाने की बात कही गई है। इस प्रकार होली मुख्यतः आनंदोल्लास तथा भाई–चारे का त्यौहार है।

 होली रंगों का त्योहार है, हँसी–ख़ुशी का त्यौहार है लेकिन आज होली के भी अनेक रूप देखने  को मिलते हैं। प्राकृतिक रंगों के स्थान पर रासायनिक रंगों का प्रचलन, भंग–ठंडाई की जगह नशेबाजी और लोक–संगीत की जगह फिल्मी गानों का प्रचलन इसके कुछ आधुनिक रूप हैभोजपुरी म्यूज़िक एल्बमों की बात करें तो इनके गीतों के बोल दोअर्थी होते हैंवीडियो एल्बमों में इनका फ़िल्मांकन बहुत ही अश्लील तरीक़े से किया जाता है।आज बाज़ार में उपलब्ध ज़्यादातर भोजपुरी एल्बमों के गीत इतने भड़काऊ होते हैं कि कई बार महिला यात्रियों को ऑटो और सार्वजनिक बसों में इन्हें बंद करवाने के लिए आवाज़ उठानी पड़ती है। एक समय रहा...जब भोजपुरी गीत, सुनने वालो में गहराई में डूब जाते थे जैसे  "नदिया के पार" के गाना "कवने दिशा में लेके चला रे बटोहिया" ।बीबीसी हिंदी के एक पत्रकार के द्वारा शारदा सिन्हा  से पूछे गये ये सवाल -  अश्लीलता के काले बादलों से घिरते जा रहे भोजपुरी होली गीतों के बीच आशा की किरण क्या हो सकती है? इस सवाल के जवाब में शारदा सिन्हा कहती हैं,हमें उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए वर्तमान में भोजपुरी गीतों पर भौंडेपन और अश्लीलता की परत ज़रूर चढ़ गई है लेकिन समय के साथ अच्छे गीतों को गाया जाएगा तो यह धूल झड़ जाएगी। हम सभी ये आशा करते है की हमारे भोजपुरी समाज के शुभचिंतक समय रहते सुधार कर लेंगे।बिहार में होली के गायन की अपनी परंपरा रही है ,और यह वर्ग और क्षेत्र के हिसाब से बंटती चलती रही है। होली गीतों के गायन से क्षेत्र विशेष के लोगों के बीच परंपराओं की जानकारी मिल जाती है।होली पर्व के पीछे तमाम धार्मिक मान्यताएं, परम्पराएं और ऐतिहासिक घटनाएं छुपी हुई हैं। पर अंतत: इस पर्व का उद्देश्य मानव–कल्याण ही है। लोकसंगीत, नृत्य, नाट्य, लोककथाओं, क़िस्से–कहानियों और यहाँ तक कि मुहावरों में भी होली के पीछे छिपे संस्कारों, मान्यताओं व दिलचस्प पहलुओं की झलक मिलती है।वास्तव में हमारे द्वारा होली का त्यौहार मनाना तभी सार्थक होगा जब हम इसके वास्तविक महत्व को समझकर उसके अनुसार आचरण करें।इसलिए वर्तमान परिवेश में जरूरत है कि इस पवित्र त्यौहार पर आडम्बर की बजाय इसके पीछे छुपे हुए संस्कारों और जीवन मूल्यों को अहमियत दी जाए तभी व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र सभी का कल्याण होगा।
...............................................................................रणजीत कुमार 

Monday, 7 March 2016

women day(महिला दिवस)

8 मार्च का दिन हमें याद दिलाता है कि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है.सिर्फ एक दिन के लिए महिलाओं का गुनगान करके उन्हें सम्मान देना और दूसरी और उनको इंसान की शक्ल में घूमने वाले न जाने कितने भेडियों की शिकार होती है यह नारी, जिसका ज़िक्र तक नहीं होता समाज में, न ही उसके बारे में किसी को जानकारी हो पाती है .छलना, उनके साथ कपट भाव रखना, रास्ते चलते छेड़छाड़ करना, स्त्री को लज्जित करना, शराब पीकर महिलाओं के साथ मारपीट करना ...यह सब हमारे पुरुष वर्ग को शोभा नहीं देता.अगर सच में महिलाओं के प्रति हमारे मन में आदर और सम्मान है तो सबसे पहले हमें चाहिए कि हम उन मां, बहन, बेटियों, बहुओं और उन मासूम बच्चियों के प्रति पहले अपना नजरिया बदलें और उन्हें हीन दृष्टि से देखना बंद करें.महिला दिवस मनाने का केवल यह मतलब नहीं है कि एक दिन तो बहुत ऊंचे स्थान पर बैठाकर मान-सम्मान दे दिया जाए और दूसरे ही दिन राह चलती लड़कियों से छेड़खानी शुरू कर दी जाए.कभी धर्म को हथियार बनाकर, तो कभी संस्कारों, परम्परा, लोक लाज की आड़ लेकर आए दिन तुगलकी फरमान जारी किए जाते हैं जो महिलाओं को सुरक्षा देने के बहाने उनपर ही लगाम लगा जातीं हैं.
अतीत में नारी के प्रति अन्याय, अत्याचार के गवाह सती प्रथा, विधवा विवाह निषेध,बाल विवाह,पर्दा प्रथा जैसी प्रथाओं का अंत होने बावजूद नारी शोषण आज भी जारी है.दहेज़ हत्यायें,बलात्कार,घरेलु हिंसा आज भी नित्य समाचार पत्रों की सुर्खियाँ बन रही है.महिला आयोग द्वारा किये जा रहे प्रयास एवं कानूनी योगदान प्रभावकारी साबित नहीं हो पाए है. प्रत्येक नारी को स्वयं शिक्षित, आत्म निर्भर हो कर, अपने अधिकार पुरुष से छिनने होंगे. दुर्व्यवहार बलात्कार जैसे घिनोने अपराधों से लड़ने के लिए अपने अंदर शक्ति उत्पन्न करना होगा.औरअंत में मैथिलीशरण गुप्त जी ये पंक्तियाँ याद आता है मुझे
“ अबला जीवन, हाय, तुम्हारी यही कहानी
आँचल में है दूध और आँखों में पानी . “
...................................................................................................रणजीत कुमार 

Monday, 22 February 2016

Politician(राजनेता)


क्रिकेट के खिलाडी क्रिकेटर कहलाते है
ठीक वैसे ही राजनितिक के खिलाडी राजनेता कहलाते है।
राजनेता ,नेता जी के नाम से भी जाने जाते है।
राज -पाठ का संचालन,लोकतांत्रिक नीति अपनाते है।
लोकतंत्र की चुनावी विगुल बजते
नेता जी को जनता की याद सताती है।
नेता जी,जनता की हर छोटी-बड़ी समस्याएं
अपने पार्टी का चुनावी मुद्दा बनाते है।
देश में बढ़ते राजनितिक पार्टी ,हर एक पार्टी के नेता
जनता का सच्चा जनसेवक,धर्मनिपेक्ष बताते है।
नेता जी ,अपने से विरोधी पार्टी
परिवारवाद - जातिवाद से प्रेरित
राजनीति करने का आरोप लगाते है।
नेता जी ,चुनावी जनसभा -रैली कर
एक -दूसरे पार्टी के ऊपर बढ़ती मँहगाई
बेरोजगारी और जनता के विकासविरोधी का भी ताने देते है।
आम जनता सभी पार्टी का भाषण सुन -सुन कर
अपने क्षेत्र का सही नेता चुनना
असमंजस में पड़ जाते है।
जब चुनावी नतीजे आते है ,सरकार गठन करने में स्पष्ट वहुमत
किसी पार्टी का नही आता है।
जोड़ -तोड़ की राजनीति कर ,गठबंधन की सरकार बनाते है।
झूठे वादे ,कोरा आश्वासन नेता जी देना बंद करो
क्योकि जिस देश का युवा जागा है,परिवर्तन का नया इतिहास लिखाया है। 


रणजीत कुमार

Sunday, 14 February 2016

just strat(शुरुवात तुम्हें ही करना है।)

प्रतिदिन पुस्तकालय जाना 
समाचारपत्र पढ़ना।
 देश - दुनिया का  खबरें तो जान लिया 
मगर खुद का खबर
अखबारों में पढ़ना। ....
असंख्य पड़े पुस्तको का गहन अध्ययन कर।
ज्ञान पुंज तुम्हें  हीं उत्सर्जित करना होगा।
 प्रतिदिन व्यायामशाला जाना   
आईने को घंटो निहारना। 
दूसरे के सुगठित देख शरीर 
खुद को  तुलना करना। 
काश !आहे भरना बंद करो। 
व्यायामशाला में पड़े औजारों से खेलना
शुरुवात तुम्हें ही  करना है। 

रणजीत कुमार 

Friday, 5 February 2016

The cooleness my heart( मेरे दिल की ठंढ़क)



चेहरे पर नन्हे बच्चे  जैसा मासूमियत  
होंठो  पर हल्की मुस्कान। 
बतो में शालीनता ,ब्यवहार  में विनम्रता। 
नयनो में  सुरमा लगाये ,नयन तीर चलाती हो। 
मेरा दिल घायल  
तड़प -तड़प के  नजरें  तुमको ढूंढती है। 
एक नजर तुमको
 देखने को पागल दिल हो जाता है। 
एक नजर तुमको देखते
मेरे दिल  की ठंढ़क होती है।
      रणजीत कुमार